वर्तमान के दिगम्बर जैन मंदिर निर्माण का इतिहास

कई राजनीतिक और प्रकृति कारणों से हस्तिनापुर मध्यकाल के पश्चात् शताब्दियों तक उपेक्षित रहा. इसी उपेक्षा परिणामस्वरूप लगता है. यहाँ के प्राचीन मंदिर और निष्धिकाएं नष्ट हो गयी. किन्तु तीर्थ स्थान तो यह बराबर बना रहा और भक्त लोग यात्रा के लिए आते रहे. 18-19 वी शताब्दी में यहाँ मंदिर और निशियों की हालत बड़ी जीर्ण-शीर्ण थी. सभी लोगो की इच्छा थी कि यहाँ मंदिर अवश्य बनना चाहिए. लोगो कि प्राथना पर सं. 1858 (सन 1801) ज्येष्ठ वादी 13 के मेले में दिल्ली निवासी राजा हरसुख राय जो मुग़ल बादशाह शाह आलम के खजांची थे, उन्होंने मंदिर के लिए अपनी स्वीकृति दे दी.

दूसरे दिन राजा हरसुखराय, लाला जयकुमारमल और सैकड़ो जैन व्यक्तियों की उपस्थिति में राजा नैनसिंग ने धरातल से चालीस फीट ऊंचे टीले पर दिगम्बर जैन मंदिर की नीव में अपने हाथों से पाँच ईंटे रखी. इसके बाद राजा हरसुखराय के धन से लाला जयकुमार की देख-रेख में पांच वर्ष में विशाल शिकरबंद दिगम्बर जैन मंदिर का निर्माण हुआ. कहते हैं, जब कलशरोहाण और वेदी-प्रतिष्ठा का अवसर आया तो राजा हरसुखराय ने पंचायत में प्राथना की - पंच सरदारों! मेरी जितनी शक्ति थी, मैंने उतना कर दिया, मंदिर आप सबका है अत आप लोग भी इसके लिए सहायता करें. उस समय जो लोग वहां उपस्थिति थे, उनके सामने घड़े में दाना डाला गया, किन्तु फिर भी यह राशि अत्यंत अल्प थी. मंदिर निर्मित सभी जैन भाइयों से इस तरह एकत्रित करने में राजा साहब का उददेश्य मंदिर को सार्वजनिक बनाना और अपने को अहंभाव से दूर रखना था.

ततपश्चात सम्वत 1813 में कलशरोहण और वेदी-प्रतिष्ठा का कार्य राजा साहब ने समारोह-पूर्वक कराया. उस समय मंदिर में दिल्ली से लायी हुई भगवान पार्श्वनाथ जी की बिना फणवाली प्रतिमा विराजमान की गयी. वि.स. 1817 में लाला जयकुमारमल ने मंदिर का विशाल सिंह द्वार बनवाया.

इस मंदिर के चारों ओर धर्मशाला बनाई गयी(यह सभी जिन मंदिरों से रूप में परिवर्तित हैं). मंदिर के बाहर की कई दिगम्बर जैन धर्मशालाए बनी हुई हैं. मंदिर में बहुत सा काम राजा हरसुखराय के पुत्र राजा शुगनचंद जैन ने कराया था. इन्हीं के वंशज धर्मं परायण, मुस्कराहटों के धनी एव समाज के लिए समर्पित लाला त्रिलोकचंद जी जैन - भारत नगर दिल्ली निवासी, क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष पद को शोभायमान कर रहे है.

पौराणिक ओर ऐतिहासिक ओर सांस्कृतिक नगरों में की जाती है. मानव विकास के आदिकाल से ही यह राजनितिक, सांस्कृतिक ओर आध्यात्मिक घटनाओं की लीला भूमि रही है. आदि तीर्थकर भगवान ऋशभदेव ने 52 आर्य देशों की स्थापना की थी. उनमें कुरु जांगल देश भी था. इस प्रदेश की राजधानी का नाम गजपुर था. संभवत इस प्रदेश के गंगा तटवर्ती जंगल में हाथियों का बाहुल्य हने के कारण यह गजपुर कहलाने लगा. इसके पश्चात कुरुवंश में 'हस्तिन' यह गजपुर कहलाने लगा. इसके पश्चात कुरुवंश में 'हस्तिन' नाम का एक प्रतापी राजा हुआ. उसके नाम पर इसका नाम हस्तिनापुर हो गया. प्राचीन साहित्य में इस नगर के कई नाम आते हैं. जैसे- गजपुर, हस्तिनापुर, गज सहव्यपुर, नागपुर आस्न्दीवत, ब्रहास्थल, "शांतिनगर" कुंजरपुर आदि.